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कविता संसार --- हिन्दी - उर्दू कविताओं का एक छोटा सा संग्रह।

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Wednesday, November 21, 2012

आज मैंने अपना फिर सौदा किया


आज मैंने अपना फिर सौदा किया
और फिर मैं दूर से देखा किया

ज़िन्‍दगी भर मेरे काम आए असूल
एक एक करके मैं उन्‍हें बेचा किया

कुछ कमी अपनी वफ़ाओं में भी थी
तुम से क्‍या कहते कि तुमने क्‍या किया

हो गई थी दिल को कुछ उम्‍मीद सी
खैर तुमने जो किया अच्‍छा किया

Tuesday, November 20, 2012

Mera apna tajorba hai..... wahi batla raha hoon main

Mera apna tajorba hai..... wahi batla raha hoon main !
Koi lab chhoo gayatha tab, ke ab tak gaa raha hoon main !!
Bichhud tum se ab kaise jiya jaaye bina tadpe !
jo main khud nahi samjha, wahi samjha raha hoon main !!!

Wednesday, October 24, 2012

मेरे देश में हर दिन त्‍योहार


मेरे देश में हर दि‍न त्योहार ।
दि‍न दूना और रात चौगुना बढ़ता जाये प्यार।
मेरे देश में हर दि‍न त्योहार।

महक उठा मन सौंधी खुशबू जो लाई पुरवाई।
धानी चूनर पहन खेत की हर बाली मुसकाई।
डाली-डाली फूल खि‍ले मौसम ने ली अँगड़ाई।
गली मोहल्ले घर-घर में खुशि‍यों की बँटी मि‍ठाई।
झूम-झूम कर नाचो आओ, गाओ मेघ मल्हार।
मेरे देश में हर दि‍न त्योहार।

आता है हर साल दशहरा, टि‍क्का, ईद, दि‍वाली।
क्वार करे काति‍क का स्वागत, सरदी देव-दि‍वाली।
पौष बड़ा, मावठ फुहार, होली में मीठी गाली।
ढोल, नगाड़े, चंग, मजीरा, ढफ, अलगोजा, ताली।
घूम-घूम कर रँगो-रँगाओ, गाओ ध्रुपद धमार।
मेरे देश में हर दि‍न त्योहार।

आगे पीछे दौड़े आते पर्व मनोरथ सारे।
दु:ख हल्के करते संस्कृति‍ के ये हैं अजब सहारे।
सर्वधर्म समभाव, अति‍थि देवो भव से हर नारे।
सत्यमेव जयते, वसुधैवकुटुम्बकम् के गुण न्यारे।
भूम-भूम गोपाल सजाओ, गाओ बसन्त बहार।
मेरे देश में हर दि‍न त्योहार।


रचनाकार - गोपाल कृष्‍ण भट्ट 'आकुल'

Monday, August 6, 2012

दीया अंतिम आस का [एक सिपाही की शहादत के अंतिम क्षण ]

दीया अंतिम आस का, प्याला अंतिम प्यास का
वक्त नहीं अब, हास परिहास उपहास का
कदम बढाकर मंजिल छू लूँ, हाथ उठाकर आसमाँ
पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का

बस एक बार उठ जाऊँ, उठकर संभल जाऊँ
दोनों हाथ उठाकर, फिर एक बार तिरंगा लहराऊँ
दुआ अंतिम रब से, कण अंतिम अहसास का
कतरा अंतिम लहू का, क्षण अंतिम श्वास का


बस एक बूँद लहू की भरदे मेरी शिराओं में
लहरा दूँ तिरंगा मैं इन हवाओं में........
फहरा दूँ विजय पताका चारों दिशाओ में
महकती रहे मिट्टी वतन की, गूंजती रहे गूंज जीत की
सदियों तक सारी फिजाओं में………..


सपना अंतिम आँखों में, ज़स्बा अंतिम साँसों में
शब्द अंतिम होठों पर, कर्ज अंतिम रगों पर
बूँद आखरी पानी की, इंतज़ार बरसात का
पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का…

अँधेरा गहरा, शोर मंद,
साँसें चंद, हौंसला बुलंद,
रगों में तूफान, ज़ज्बों में उफान,
आँखों में ऊँचाई, सपनों में उड़ान
दो कदम पर मंजिल, हर मोड़ पर कातिल
दो साँसें उधार दे, कर लूँ मैं सब कुछ हासिल

ज़ज्बा अंतिम सरफरोशी का, लम्हा अंतिम गर्मजोशी का
सपना अंतिम आँखों में, ज़र्रा अंतिम साँसों में
तपिश आखरी अगन की, इंतज़ार बरसात का

फिर एक बार जनम लेकर इस धरा पर आऊँ
सरफरोशी में फिर एक बार फ़ना हो जाऊँ
गिरने लगूँ तो थाम लेना, टूटने लगूँ तो बाँध लेना
मिट्टी वतन की भाल पर लगाऊँ
मैं एक बार फिर तिरंगा लहराऊँ
दुआ अंतिम रब से, कण अंतिम अहसास का

कतरा अंतिम लहू का, क्षण अंतिम श्वास का
पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का......

दिनेश गुप्ता 'दिन'

Sunday, July 15, 2012

Kavya kosh is now Kavita Sansar

http://merikuchmanpasandkavitayein.blogspot.in is now http://www.kavitasansar.com/



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