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कविता संसार --- हिन्दी - उर्दू कविताओं का एक छोटा सा संग्रह।

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Wednesday, June 29, 2011

भगवदाश्रम


मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै ।
जैसें उड़ि जहाज को पच्छी; फिरि जहाज पर आवै ।
कलम-नैन कौ छाँड़ि महातम, और देव कौं ध्वावै ॥
परम गंग कौं छाँड़ि पियासौ, दुरमति कूप खनावै ।
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यौं करील-फल भावै ।
सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ॥1॥

हमैं नँदनंदन मोल लिये ।
जम के फंद काटि मुकराए, अभय अजाद किये ।
भाल तिलक, स्रबननि तुलसीदल, मेटे अंक बिये ।
मूँड्यौ मूँड़, कंठ बनमाला, मुद्रा चक्र दिये ।
सब कोउ कहत गुलाम स्याम कौ, सुनत सिरात हिये ।
सूरदास कों और बड़ौ सुख, जूठनि खाइ जिये ॥2॥

राखौ पति गिरिवर गिरि-धारी !
अब तौ नाथ, रह्यौ कछु नाहिन, उघरत माथ अनाथ पुकारी ।
बैठी सभा सकल भूपनि की, भीषम-द्रोन-करन व्रतधारी ।
कहि न सकत कोउ बात बदन पर, इन पतितनि मो अपति बिचारी ।
पाँडु-कुमार पवन से डोलत, भीम गदा कर तैं महि डारी ।
रही न पैज प्रबल पारथ की, जब तैं धरम-सुत धरनी हारी ।
अब तौ नाथ न मेरौ कोई, बिनु श्रीनाथ-मुकुंद-मुरारी ।
सूरदास अवसर के चूकैं फिरि पछितैहौ देखि उघारी ॥2॥

Guru mahima


गुरु बिनु ऐसी कौन करै ?
माला-तिलक मनोहर बाना, लै सिर छत्र धरै ।
भवसागर तैं बूड़त राखै, दीपक हाथ धरै ।
सूर स्याम गुरु ऐसौ समरथ, छिन मैं ले उधरै ॥
***

कृष्ण गोपिका



नंद-नंदन तिय-छबि तनु काछे ।
मनु गोरी साँवरी नारि दोउ, जाति सहज मै आछे ॥
स्याम अंग कुसुमी नई सारी, फल-गुँजा की भाँति ।
इत नागरि नीलांबर पहिरे, जनु दामिनि घन काँति ॥
आतुर चले जात बन धामहिं, मन अति हरष बढ़ाए ।
सूर स्याम वा छबि कौं नागरि, निरखति नैन चुराए ॥1॥

स्यामा स्याम कुंज बन आवत ।
भुज भुज-कंठ परस्पर दीन्है, यह छबि उनहीं पावत ॥
इततैं चंद्रावली-जाति ब्रज, उततैं ये दौउ आए ।
दूरहि तैं चितवति उनहीं तन, इक टक नैन लगाए ॥
एक राधिका दूसरि को है, याकौं नहि पहिचानैं ।
ब्रज-बृषभानु-पुरा-जुवतिनि कौं, इक-इक करि मैं जानौ ॥
यह आई कहूँ और गाँव तैं, छबि साँवरौ सलोनी ।
सूर आजु यह नई बतानी, एकौ अँग न बिलोनी ॥2॥

यह भृषभानु-सुता वह को है ।
याकी सरि जुवती कोउ नाहीं, यह त्रिभुवन-मन मोहै ॥
अति आतुर देखन कौं आवति, निकट जाइ पहिचानौं ।
ब्रज मैं रहति किधौं कहुँ ओरै, बूझे तैं तब जानौं ॥
यह मोहिनी कहाँ तैं आई, परम सलोनी नारी ।
सूर स्याम देखत मुसुक्यानी, करी चतुरई भारी॥3॥

कहि राधा ये को हैं री ।
अति सुंदरी साँवरी सलोनी, त्रिभुवन-जन-जन मोहैं री ।
और नारि इनकी सरि नाहीं, कहौ न हम-तन जोहैं ।
काकी सुता, बधू हैं काकी, जुवती धौं हैं री ॥
जैसी तुम तैसी हैं येऊ, भली बनी तुमसौं है री ।
सुनहु सूर अति चतुर राधिका, येइ चतुरनि की गौ हैंरी ॥4॥

मथुरा तैं ये आई हैं ।
कछु संबंध हमारी इनसौं, तातैं इनहिं बुलाई हैं ॥
ललिता संग गई दधि बेंचन, उनहीं इनहीं चिन्हाई हैं ।
उहै सनेह जानि री सजनी, आजु मिलन हम आई हैं ॥
तब ही की पहिचानि हमारी,ऐसी सहज सुभाई हैं ।
सूरदास मोहिं आवत देखी, आपु संग उठि धाई हैं ॥5॥

इनकौं ब्रजहीं क्यौं न बुलावहु ।
की वृषभान पुरा, की गोकुल, निकटहिं आनि बसावहु ॥
येऊ नवल नवल तुमहूँ हौ, मोहन कौं दोउ भावहु ।
मोकौं देखि कियौ अति घूँघट, बाहैं न लाज छुड़ावहु ।
यह अचरज देख्यौ नहिं कबहुँ, जुवतिहिं जुवति दुरावहु ।
सूर सखी राधा सौं पुनि पुनि, कहति जु हमहिं मिलावहु ॥6॥

मथुरा मैं बस बास तुम्हारौ ?
राधा तैं उपकार भयौ वह, दुर्लभ दरसन भयो तुम्हारी ॥
बार-बार कर गहि निरखति, घूँघट-ओट करौ किन न्यारौ ।
कबहुँक कर परसति कपौल छुइ, चुटकि लेति ह्याँ हमहिं निहारी ॥
कछु मैं हूँ पहिचानति तुमकौं, तुमहि मिलाऊँ नंद-दुलारौ ।
काहें कौं तुम सकुचति हौ जू, कहौ काह है नाम तुम्हारौ ॥
ऐसौ सखी मिली तोहि राधा, तौ हमकौं काहै न बिसारौ ।
सूरदास दंपति मन जान्यौ, यातैं कैसैं होत उबारौ ॥7॥


ऐसी कुँवरि कहाँ तुम पाई ।
राधा हूँ तैं नख-सिख सुंदरि, अब लौं कहाँ दुराई ॥
काकी नारि कौन की बेटी, कौन गाउँ तैं आई ।
देखी सुनि न ब्रज, वृंदावन, सुधि-बुधि हरति पराई ॥
धन्य सुहाग भाग याकौ, यह जुवतिनि की मनभाई ।
सूरदास-प्रभु हरिषि मिले हँसि, लै उर कंठ लगाई ॥8॥


नंद-नंदन हँसे नागरी-मुख चितै, हरिषि चंद्रावली कंठ लाई ।
बाम भुज रवनि, दच्छिन भुजा सखी पर, चले बन धाम सुख कहि न जाई ।
मनौ बिबि दामिनी बीच नव घन सुभग, देखि छबि काम रति सहित लाजै ॥
किधौं कंचन लता बीच सु तमाल तरु, भामिनिनि बीच गिरधर बिराजै ।
गए गृहकुंज, अलिगुंज, सुमननि पुंज, देखि आनंद भरे सूर स्वामी ।
राधिका-रवन, जुवती-रवन, मन-रवन निरखि छवि होत मनकाम कामी ॥9॥

Monday, June 27, 2011

ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।



ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
बृंदावन गोकुल तन आवत सघन तृनन की छाहीं॥
प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत।
माखन रोटी दह्यो सजायौ अति हित साथ खवावत॥
गोपी ग्वाल बाल संग खेलत सब दिन हंसत सिरात।
सूरदास, धनि धनि ब्रजबासी जिनसों हंसत ब्रजनाथ॥

शब्दार्थ :- गोकुल तन = गोकुल की तरफ। तृनन की = वृक्ष-लता आदि की। हित =स्नेह। सिरात = बीतता था।

भावार्थ :- निर्मोही मोहन को अपने ब्रज की सुध आ गई। व्याकुल हो उठे, बाल्यकाल का एक-एक दृष्य आंखों में नाचने लगा। वह प्यारा गोकुल, वह सघन लताओं की शीतल छाया, वह मैया का स्नेह, वह बाबा का प्यार, मीठी-मीठी माखन रोटी और वह सुंदर सुगंधित दही, वह माखन-चोरी और ग्वाल बालों के साथ वह ऊधम मचाना ! कहां गये वे दिन? कहां गई वे घड़ियां ?

ऊधो, मन माने की बात।


ऊधो, मन माने की बात।
दाख छुहारो छांड़ि अमृतफल, बिषकीरा बिष खात॥
जो चकोर कों देइ कपूर कोउ, तजि अंगार अघात।
मधुप करत घर कोरि काठ में, बंधत कमल के पात॥
ज्यों पतंग हित जानि आपुनो दीपक सो लपटात।
सूरदास, जाकौ जासों हित, सोई ताहि सुहात॥

टिप्पणी :- `अंगार अघात,' तजि अंगार न अघात' भी पाठ है उसका भी यही अर्थ होता है, अर्थात अंगार को छोड़कर दूसरी चीजों से उसे तृप्ति नहीं होती। `तजि अंगार कि अघात' भी एक पाठान्तर है। उसका भी यही अर्थ है।

शब्दार्थ :- `अंगार अघात,' =अंगारों से तृप्त होता है , प्रवाद है कि चकोर पक्षी अंगार चबा जाता है। कोरि =छेदकर। पात =पत्ता।

ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी।


ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी।
सब नदियाँ जल भरि-भरि रहियाँ सागर केहि बिध खारी॥
उज्ज्वल पंख दिये बगुला को कोयल केहि गुन कारी॥
सुन्दर नयन मृगा को दीन्हे बन-बन फिरत उजारी॥
मूरख-मूरख राजे कीन्हे पंडित फिरत भिखारी॥
सूर श्याम मिलने की आसा छिन-छिन बीतत भारी॥
भावार्थ :- गोपियाँ भगवान कृष्ण के प्रति अपने प्रेम के प्रतिदानस्वरूप विरह को प्राप्त करती हैं। लेकिन वे इसे विधि का विधान कहकर आश्वस्त रहती हैं। वे ऊधो से कहती हैं कि हे ऊधो, प्रकृति का नियम एकदम उलटा है। धरती पर जितनी भी नदियाँ हैं वे सब की सब अपना मीठा जल सागर में डाल रही हैं लेकिन वह फिर भी खारा ही है। छद्म-तपस्वी बगुले को उसने सफेद रंग दिया है जबकि मीठा बोलने वाली कोयल को काला बना दिया। सुन्दर नेत्रों वाला हिरन जंगल में मारा-मारा फिरता है। अनपढ़ लोग धन से खेलते हैं जबकि ज्ञानी लोग अपना जीवन भीख माँगकर पूरा करते हैं। सूरदास कहते हैं कि गोपियों ने कहा--इसी तरह श्याम से मिलने की हमारी इच्छा जितनी बढ़ती जाती है, उतना ही यह वियोग हमें भारी प्रतीत होता है।

Kavya kosh is now Kavita Sansar

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